गुरुवार, 17 सितंबर 2015

हिंदी दिवस के अवसर पर पूरे देश में सरकारी, गैर सरकारी संस्थानों में आयोजनों का दौर चल रहा है l हिंदी के सामने आज भी अनेक बाधाएँ हैं जो विस्तार में आड़े आ रही हैं l निस्संदेह हिंदी सिनेमा और कंप्यूटर के क्षेत्र में हिंदी ने विस्तार के नए आयाम स्थापित किये है l बाज़ारवाद ने भी हिंदी को (मज़बूरी में ही सही) सहारा दिया है l आज जनसंचार के माध्यमों में हिंदी का अपना पाठक और दर्शक वर्ग है l बदलते दौर में हिंदी ने भी आवश्यक बदलाव अपनाकर विकास की राह ली है l इतना सब कुछ हिंदी बोलने वालों के बाज़ार के कारण हो सका है l प्रश्न यह है कि क्या राजनैतिक स्तर पर यह देश लाचार हो गया है? कब राजनैतिक इच्छाशक्ति में बढ़ोत्तरी होगी, हिंदी में रोजगार के सीमित अवसरों से छुटकारा मिलेगा और यह भाषिक पलायन रुक सकेगा l

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