गुरुवार, 24 अगस्त 2017

दरख़्त

खोदता रहा 
मैं स्वयं अपनी ही जड़ें, 
कभी सुबह-कभी शाम
लिए - हाथों में खुरपी और फावड़े, 
आखिर कब तक बनी रहेंगी 
सामाजिकता की मज़बूत
और टिकाऊ जड़ें--
एक दिन आ ही गया
वह समय,
स्वयं जब मैंने
अपने ही हाथों से;
गिरा दिया अपने विश्वास का एक अनश्वर दरख़्त----!

© हर्ष 

2 टिप्‍पणियां:

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  2. अति सुन्दर
    अपने ही वजूद को इंसान सारी उम्र ढूंढता रहता है...

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