दरख़्त
खोदता रहा
मैं स्वयं अपनी ही जड़ें,
कभी सुबह-कभी शाम
लिए - हाथों में खुरपी और फावड़े,
आखिर कब तक बनी रहेंगी
सामाजिकता की मज़बूत
और टिकाऊ जड़ें--
एक दिन आ ही गया
वह समय,
स्वयं जब मैंने
अपने ही हाथों से;
गिरा दिया अपने विश्वास का एक अनश्वर दरख़्त----!
© हर्ष
खोदता रहा
मैं स्वयं अपनी ही जड़ें,
कभी सुबह-कभी शाम
लिए - हाथों में खुरपी और फावड़े,
आखिर कब तक बनी रहेंगी
सामाजिकता की मज़बूत
और टिकाऊ जड़ें--
एक दिन आ ही गया
वह समय,
स्वयं जब मैंने
अपने ही हाथों से;
गिरा दिया अपने विश्वास का एक अनश्वर दरख़्त----!
© हर्ष
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जवाब देंहटाएंअति सुन्दर
जवाब देंहटाएंअपने ही वजूद को इंसान सारी उम्र ढूंढता रहता है...